अलवर, भानगढ़ और सरिस्का की सैर… आओ कभी हवेली पर

सुबह के सात बजे हैं, पास रखी मेज़ पर फ़ोन बजता है, अलार्म नहीं है, दीदी का मैसेज है.  एक यूट्यूब लिंक.  नींद में अलसायी आंखें अचानक खुल गयीं.  दीदी को फ़ोन मिलाया, “कहाँ चलना है? जहाँ भी, बस चलो.  “सरिस्का, यहां से चार-साढ़े चार घंटे का सड़क का रास्ता  है”, दूसरी तरफ से जवाब आया.  “तो ठीक है बुकिंग करा ले.”

बस फिर क्या था, चलिए मेरे साथ अलवर और सरिस्का कि सैर पर… 

थोड़ा क्रेडिट IRCTC को भी दे देते हैं! अगली सुबह दिल्ली कैंट से करीब 9:15 पर गरीबरथ ट्रेन में टिकट बुक करा ली और 11:30 पहुँच गए अलवर शहर. 

गुल्लू सोनी जी की टैक्सी सर्विस से दो दिन के लिए एक टैक्सी बुक करा ली और स्टेशन पर हमें मिले नवल जी हमारे गाइड और ड्राइवर.

अरे ! यह बात बताना तो भूल ही गयी,  यह एक 5 खूबसूरत महिलाओं का ट्रिप था, जिसमें 60 से ऊपर भी और 30 साल से कम वाली भी.  दिल्ली के करीब बसा राजस्थान का शहर, अलवर. 

अलवर, राजस्थान कि रेतीली धूल में सना, बड़े शहरों के किनारे का अतरंगी ढंग लिए अलसाया हुआ छोटा सा शहर.  स्टेशन से निकले और पहुँच गए सुबह के नाश्ते की कचौड़ी और समोसे के लिए जोधपुर स्वीट शॉप.  कचौड़ी में मसाला भरा ही जा रहा था कि हम पहुँच गए.  तभी नवल जी ने बगल में एक चाय का खोका और दिखा दिया.  मैं पहुँच गयी चाय बनवाने, तो चाय वाले भैया ने पूछा कहाँ से हैं आप लोग ?

मैंने कहा उत्तराखंड, तो जवाब मिला, मैं अभी कुछ समय पहले ही वहां से लौटा हूँ.  छह महीने बद्रीनाथ रहता हूँ और छह महीने यहां अपने घर राजस्थान में.  तो यात्रा की शुरुआत हुई खस्ता कचौड़ी और गरमा गरम अदरक वाली चाय से.  वो कहते हैं न कि मंज़िल से भी खूबसूरत होता है सफ़र.  

सर्दी के कोहरे की चादर के ऊपर चमकता सूरज और सड़क से कुछ दूर छोटी-छोटी अरावली की पहाड़ियां.  हमारी गाड़ी भी चल पड़ी घुमावदार पहाड़ी सड़क पर.  कुछ 10 किलोमीटर का यह रास्ता हमें ले जाता है बाला किला में, जो पहाड़ी के ऊपर बना हुआ है.  इसको अलवर फोर्ट नाम से भी जाना जाता है.  इस इलाके की खूबसूरत बात यह है कि यहां मोर बहुत दिखेंगे और  रास्ते में सांभर भी विचरते दिख जाते हैं.  सड़क से सामने की पहाड़ी पर कड़ी चढ़ाई करती किले की पुरानी सीढ़ियां दिख जाती हैं.  ऐसे दुर्गम रास्ते और इतनी ऊंचाई पर बनी किले की दीवार देखते ही बनती है.  

किलों और राजाओं की कहानी और रहस्य और खज़ाना न हो ऐसा होता है कभी? 

कहते हैं यह एक ऐसा किला है जहाँ से कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा गया. फिर भी यहां राजपूत, मुग़ल , मराठा और यादव सभी ने राज किया.   कुछ किंवदंतियां यह भी कहती हैं कि यहां कुबेर का खजाना छिपा है.  खैऱ हमारे लिए तो  यह आलीशान वास्तुकला ही खज़ाना है.  किला करीब 5 किलोमीटर  तक फैला है और अंदर एक छोटा  सा महल और मंदिर हैं.

किले  के बाहर से दीवार के साथ साथ जंगल से होती एक पगडंडी एक कैनन पॉइंट तक ले जाती है.  यह किले का एक ऊंचा स्थान है  जहाँ से किले की निगरानी की जाती थी और एक तोप आज भी यहां विराजमान है.  यहां से पूरे अलवर शहर का एक मनोरम दृश्य मिलता है, मानो पूरे शहर की निगरानी की जा रही हो. 

छोटी छोटी पहाड़ियों से घिरा, लोगों की चहल पहल, ट्रैफिक की भीड़ भाड़ में अपनी ही धूनि रमाये, अलवर.  इस जगह के दांयी ओर ऊपर बाला किला है और नीचे मनमोहक पीली हुई सरसों के खेत.  और बायीं ओर पूरा शहर.  शहर में ही ठीक नीचे एक खूबसूरत सा कुंड था, जिसमें फव्वारा चल रहा था और साथ ही एक छतरी नुमा महल.  

तो हमने भी नवल जी से कहा ले चलिए उस कुंड और छतरी की ओर.  महारानी मूसी रानी की छतरी.  यह पूरा कॉम्प्लेक्स एक महल है और उसके पीछे एक खूबसूरत तालाब और अलवर के शासक महाराजा बख्तावर सिंह और उनकी रानी मूसी की याद में विनय सिंह द्वारा बनवाई गई छतरी.  वास्तुकला का एक अनूठा नमूना है यह सब. 

मुख्य महल में अब अलवर कलेक्टरेट ऑफिस है और ऊपर की मंज़िल में अलवर म्यूजियम.  यहीं से बायीं ओर से सीढ़ियां पीछे छतरी और तालाब की तरफ पहुँचती हैं.  लाल पत्थर और संगमरमर से बनी एक शानदार संरचना और साथ ही गहरे हरे रंग सा पानी से भरा तालाब और बीच में फव्वारा.  तालाब के सामने एक पहाड़ी और ऊपर दिखती बाला किले की दीवार.  शहर भले ही हम संगदिल इंसानों ने घेर लिया हो, पर राज आज भी मोरों का चलता है यहां.  और छतरी के आसपास भी अक्सर कई खूबसूरत मोर दिख जाते हैं.  

अब लग गयी भूख! कचौड़ी और समोसे के बाद दिन के खाने का समय कब निकला पता ही नहीं चला.  और शाम तक सरिस्का पहुँचने का प्लान था.  तो चल पड़ी सवारी, टहला, सरिस्का की तरफ.  और रास्ते में हम पहुंचे फौजी राज के ढाबे में.  सर्दी की धूप में बैठ कर खाना हो तो बाहर चारपाई और कुर्सियां भी हैं और अंदर होटल भी. 

शुद्ध शाकाहारी , ताज़ा और गरमा गरम खाना.  मौका मिले तो कढ़ी ज़रूर खाइयेगा.  कितना खाया याद नहीं. पेट फट गया लेकिन मन नहीं भरा.  और सवारी चल दी सरिस्का की ओर.  छोटी-छोटी पहाड़ियों को संग लेते, कभी आगे तो कभी पीछे दौड़ लगाते, हमारी गाड़ी सरपट दौड़ने लगी.  सड़क  कभी सीधी कभी मुड़ती, सरसों के पीले खेतों के बीच से चली जा रही है.  गांवों, खेत-खलिहानों के बीच से होते हुए कभी जुगाड़ गाड़ी में चले लोग मिले, तो कभी भेड़ बकरियां चराते गडरिये.  अपने बॉलीवुड के स्टाइल में बोलें तो DDLJ वाले खेत भी थे और किशोर कुमार और रफ़ी के गाने भी.   

राह में रहते हैं, 

यादों में बसर करते हैं, 

खुश रहो एहले वतन हम तो सफर करते हैं…

और गाते  बजाते पहुँच गए टहला, सरिस्का. कुछ धूल खाते भी. इस इलाके में अभी भी कुछ 10-12 संगमरमर की खदानें हैं, तो आखिर के कुछ किलोमीटर सड़क डंपर्स के बोझ से जगह जगह टूटी-फूटी मिली.  पर रास्ता लम्बा हो और सीधा सपाट  तो नींद न लग जाये? फिर याद करने को रास्ते में मिलने वाले  चटकीले घागरे, रंग बिरंगी पगड़ियां और रास्ता रोकने वाली भेड़  बकरियां कैसे देखते! और थोड़ा उछलती कूदती हमारी गाड़ी.

 सरसों के खेतों के बीच से एक कच्ची सड़क से होते हुए हम पहुँच गए अपने रात के ठिकाने वनाश्रय. सूरज ढल चूका था और ठंड  बढ़ रही थी  और जंगल के बीच इस आशियाने में स्वागत हुआ अदरक नींबू वाली गरमागरम चाय से. 

भारत के हर कोने में एक भारत बसता है.  कमाल का खुशनुमा माहौल है वनाश्रय का. कुछ अलवर राजस्थान के लोग हैं, कुछ यहां के आस-पास के गांव के पुरुष और महिलाएं और कुछ ओडिशा जैसे दूर प्रांत के लोगों की मुस्कुराहट यहां दिखती है. सबका आदर सत्कार भाव सफ़र की थकान मिटा देता है. और हम पहुंचे थे दिल्ली, उत्तराखंड और मुंबई से. हो गया न पूरा भारत, भारत के इस सुंदर बीहड़ में. 

अपने-अपने कमरे मिले और हम पसर गए. थोड़ा फ्रेश हुए और बारादरी चल दिए. बारादरी क्या है? डाइनिंग हॉल के सामने आंगन और आंगन में अंगीठी और लॉग फायर का प्रबन्ध. एक तरफ राजस्थानी लोक गीत कलाकार अपना साज़ो सामान लिए बैठे थे किस धुन से शुरुआत करें और दूसरी ओर जूस, शरबत और वाइन का बार. ऊपर आसमान में पूरा चांद, यहां थोड़ी आग और मधुर राजस्थानी संगीत. शहर के शोर से दूर, मीठे मधुर लोक गीत. हारमोनियम और सारंगी. 

रात का खाना भी बिलकुल सर्दियों वाला बढ़िया मशरूम, साग, मांस उसके साथ चूल्हे में बनी ताज़ी गर्म और कुरकुरी बाज़रे और मकई की रोटी और उस पर घी. खाना भले ही यहां के शेफ़ ने बनाया हो पर रोटी तो गांव के चूल्हे की ही मिली. लकड़ी के चूल्हे की आग में सिकी, जिसकी महक पूरे माहौल में संगीत के साथ घुल गई. खा पी कर थोड़ा टहलना तो बनता है. रिजॉर्ट बहुत बड़ा नहीं है पर बीच में एक बागीचा और इस पर बना लकड़ी का पुल है जिसके दोनों तरफ छोटी-छोटी बत्तियां टिमटिमा रही हैं.

हम जंगल के काफ़ी करीब हैं और नेशनल पार्क के बफर ज़ोन के बाहर. तो यहां भी जंगल के हिसाब से ही माहौल है. कोई स्पीकर और डेक वाले वाले संगीत का शोर नहीं, रोशनी भी उतनी जितनी ज़रूरत है. ताकि आस-पास के पशु पक्षी परेशान न हों. संगीत भी रात 9:30-10 बजे तक बस. 

एक आरामदायक बढ़िया नींद के बाद चिड़ियों के कोलाहल ने सुबह जगा दिया. सूरज उगने में अभी टाइम था.  हम सब एक चाय के सहारे झटपट तैयार हो गए. बाहर जीप आ गई थी. खुली जीप में बैठ हम सरिस्का की सफ़ारी पर चल दिए. सरिस्का एक टाइगर रिजर्व है.

800 किमी में फैला पतझड़ी जंगल में सरिस्का दुनिया का पहला ऐसा टाइगर रिज़र्व है जहाँ बाघों का स्थान परिवर्तन सफलतापूर्वक किया गया है.  कुछ साल पहले यहां सभी बाघ ख़त्म हो गए थे, फिर 2008-9 में दो बाघों को रणथम्बोर से यहां लाया गया, और आज यहां लगभग 23 बाघ और बाघिन हैं.  धोक, कैर, बेर, गूगल, सालार और अर्जुन जैसे कई पेड़ पौधे यहां देखने को मिलते हैं.  और पशु पक्षी? बाघ के इलावा तेंदुआ, जंगली सुअर, सांभर, हिरण, नीलगाय, चील, तीतर, कठफोड़वा और ढेर सारे मोर. 

हमारा अगला पड़ाव था भानगढ़. यहां से करीब 30 किमी. आगे.  भानगढ़ किला, हाँ वही राजस्थान का भानगढ़ गांव जिसके भूतिया होने की कहानी प्रचलित है और जहाँ सूर्यास्त के बाद अंदर जाना मना है.  

भानगढ़ की कहानी रहस्यमयी और बड़ी ही रोचक है. 1573 में आमेर के राजा भगवंत दास ने भानगढ़ क़िले का निर्माण करवाया था. किला बसावट के 300 सालों बाद तक आबाद रहा. 16वीं शताब्दी में राजा सवाई मान सिंह के छोटे भाई राजा माधो सिंह ने भानगढ़ किले को अपना निवास बना लिया. 

भानगढ़ का किला चारदीवारी से घिरा है जिसके अन्दर प्रवेश करते ही दायीं ओर कुछ हवेलियों के अवशेष दिखाई देते हैं. सामने बाज़ार है जिसमें सड़क के दोनों तरफ कतार में बनायी गयी दो मंजिला दुकानों के खंडहर हैं. किले के आखिरी छोर पर दोहरे अहाते से घिरा तीन मंजिला महल है जिसकी ऊपरी मंजिल लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है. भानगढ़ का किला चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है. चारों ओर पहाड़िया हैं. बारिश के मौसम में यहां की रौनक देखते ही बनती है. यहां पर चारों तरफ पहाड़ियों पर हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है. बारिश में यह नज़ारा बहुत ही सुंदर हो जाता है.

भानगढ़ को दुनिया के सबसे डरावनी जगहों में से एक माना जाता है ऐसा माना जाता है कि यहां पर आज भी भूत रहते हैं. आज भी यहां सूर्योदय होने से पहले और सूर्यास्त के बाद किसी को रुकने की इजाजत नहीं हैं.

प्रचलित  लोक कथाएं :

भानगढ़ बालूनाथ योगी की तपस्‍या स्‍थल था. जि‍सने इस शर्त पर भानगढ़ के कि‍ले को बनाने की सहमति‍ दी कि‍ कि‍ले की परछाई कभी भी मेरी तपस्‍या स्‍थल को नहीं छूनी चाहि‍ए. लेकिन राजा माधो सिं‍ह के वंशजों ने इस बात पर ध्‍यान न देते हुए कि‍ले का निर्माण ऊपर की ओर जारी रखा इसके बाद एक दि‍न कि‍ले की परछाई तपस्‍या स्‍थल पर पड़ गयी जि‍स पर योगी बालूनाथ ने भानगढ़ को श्राप देकर ध्वस्‍त कर दि‍या. बालूनाथ जी की समाधि अभी भी वहाँ पर मौजूद है.

अन्‍य कथा

भानगढ़ की राजकुमारी रत्‍नावती अपूर्व सुन्‍दरी थी. जि‍सके स्‍वयंवर की तैयारी चल रही थी. उसी राज्‍य में एक तांत्रिक सिंधिया नाम का था जो राजकुमारी को पाना चाहता था, लेकिन यह सम्भव नहीं था. इसलि‍ए तांत्रिक सिंधिया ने राजकुमारी की दासी जो राजकुमारी के श्रृंगार के लि‍ए तेल लाने बाजार आयी थी, उस तेल को जादू से सम्‍मोहि‍त करने वाला बना दि‍या. राजकुमारी रत्‍नावती के हाथ से वह तेल एक चट्टान पर गि‍रा तो वह चट्टान तांत्रिक सिंधिया की तरफ लुढ़कती हुई आने लगी और उसके ऊपर गि‍रकर उसे मार दि‍या. तांत्रिक सिंधिया ने मरते समय उस नगरी व राजकुमारी को नाश होने का श्राप दे दि‍या जि‍ससे यह नगर ध्‍वस्‍त हो गया.

भानगढ़ का बॉलीवुड कनेक्शन

यहां का बाज़ार वही है जो बहुचर्चित फिल्म करन-अर्जुन में चूड़ी बाजार दिखाया गया था.  उस फिल्म का पुराना धूल भरा भूला बिसरा गांव, इसी इलाके में फिल्माया गया.  आओ कभी हवेली पे, जी हाँ अमरीश पूरी की हवेली भी यहीं कुछ दूरी पर है, सरिस्का पैलेस. 

राजा, रानी, तांत्रिक की कहानियों से लेकर आज के गडरियों से मिलकर और फिल्मों की रुपहली दुनिया में झांकते हुए हम शाम को वापस अलवर पहुँच गए.  दिल्ली के जैसे यहां भी एक पराठे वाली गली है.  बस उसका नाम पराठे वाली गली नहीं है.  रेलवे स्टेशन के पास ही एक सड़क पर एक साथ काफी ढाबे हैं जो शाम होते ही दमक उठते हैं और यहां के तंदूर भड़क उठते हैं.  पूरी सड़क पराठों और कचौड़ियों के खुशबू से महक उठती है.  महावीर ढाबा, बाबा दा पराठा ऐसे ही कुछ  नाम हैं. हनुमान मंदिर के पास, दयानन्द मार्ग पर.  

अब घूम भी लिया, खा भी लिया, सोया जाये, सुबह की वापसी की ट्रेन पकड़नी है, डबल डेकर है तो छूटनी नहीं चाहिए.  

हां, एक और बात… अलवर आए और मिल्क केक नहीं खाया तो घर लेकर जाना मत भूलना.

(यह लेख आस्था डबराल ने अपनी यात्रा के अनुभवों पर लिखा है. आस्था पेशे से डिज़ाइनर हैं और दिल से घुमक्कड़.)

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छत्तीसगढ़ डायरी: डोंगरगढ़ – सिटी ऑफ़ ब्लिस

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