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वो आदमी तीन दिन से हमारा इंतज़ार कर रहा था…

सूर्यकुंड से महाराजपुर (मंडला)

(दिन – 14 वां)

दूरी – 03 किमी

हम सूर्यकुंड से सुबह जल्दी चले ताकि रास्ते में  हमें कोई गांव और चाय की दुकान मिले. जल्दी ही हमें ऐसा गांव मिल गया. यहां न केवल चाय बल्कि स्ट्रॉबेरी रोल और चॉकलेट कुकीज भी मिल गयी. कभी – कभी मुझे महसूस होता है कि मैं वर्तमान में नही हूं. मेरा मन हमेशा उस चीज की इच्छा करता है जिसकी मेरे शरीर को आदत है.

अब हम महाराजपुर पहुंच गये हैं. हम में से किसी को भी इस कस्बे की एनर्जी उतनी अच्छी नहीं लगी. यहां पॉल्यूशन काफ़ी ज्यादा था और सड़कें धूल से भरी. साथ ही यहां के लोग बहुत प्रश्न पूछने वाले थे. लेकिन उनके पूछने के अंदाज में वो मासूमियत नहीं थी जो अब तक हम यहां के लोगों में महसूस कर रहे थे. हमने काफी मशक्कत के बाद रुकने के लिए एक लॉज ढूंढ ली. लेकिन इस लॉज को देखकर लग रहा था कि यह किसी के रुकने से ज्यादा किसी के छुपने की जगह थी. जो रूम हमें मिला था उसकी फर्श पर मैंने एक यूज्ड कंडोम देखा. मैं उस रुम में पूरी रात नहीं सो पाया. मेरे मन में ख्याल आते रहे कि जिस मैट्रेस और कंबल का हम इस्तेमाल कर रहे हैं पता नहीं उसे पहले कैसे उपयोग किया गया होगा. अगर शॉर्ट में कहूं तो मुझे बहुत घृणास्पद लगा.

#दोस्तों से मुलाकात#

इटन और नीली – हमारे दो दोस्त हमसे मिलने आये हैं. वो लोग इसराइल के हैं और उनकी खास बात यह है कि वो हमारे साथ एक हफ्ता इस यात्रा में रहेंगे. उनसे मिलना बहुत सुखद रहा. हमारा पूरा दिन बातचीत, घूमने और तस्वीरें खींचने में बीत गया. 

#दिन – 15 वां

महाराजपुर से घाघी गांव 

दूरी – 20 किमी.

हमने सुबह नौ बजे चलना शुरू कर दिया. हम कुछ ही दूर चले थे कि एक पत्रकार ने हमें रोक लिया. उसने हमारी कुछ तस्वीरें खींची. फिर इंटरव्यू किया और बताया कि यह कल अखबार में छपेगा. मैंने पहली  बार ऐसे इंटरव्यू दिया. उसने हमारी एक एक बात को सच की तरह स्वीकार किया. लेकिन मुझे पक्का यकीन है कि वो इस इंटरव्यू को मसाला लगा कर परोसेगा. 

उसके बाद हम एक ऐसे आदमी से मिले जो पिछले तीन दिन से हमारा इंतज़ार कर रहा था. उसकी बेटी विदेशी लोगों से मिलना चाहती थी. यह उसका सपना था. वो आयी और 10-15 मिनट हमारे साथ बैठी रही. वो आश्चर्य और घबराहट के कारण थोड़ी कांप रही थी. 

जब हम ब्रेकफास्ट कर रहे थे तो लगभग 20 लोगों ने हमें घेर रखा था. वो मुझे किसी टूरिस्ट गाइड की तरह समझ रहे थे और विदेशी उनके लिए किसी विचित्र वस्तु की तरह थे. 

रास्ते में एक बाइकवाले ने हमें बहुत सारे अमरूद दिये. एक पुलिस अधिकारी ने रोक कर हमसे बात की. फिर हमने एक बाबाजी से चिलम पी और भी कई कहानियां हुईं जिनका जिक्र फिर कभी. 

आज हमने नर्मदा मैया का अभी तक का सबसे खूबसूरत हिस्सा ढूंढ़ा. वहां हम तीन घंटे बैठे रहे. फिर हम एक खूबसूरत आश्रम पहुंचे. हमारी सोने की जगह आधी खुली और आधी दीवार से ढकी थी. यहां खाना अच्छा था और ठंड उतनी नहीं थी. 

नीली और इटन – यह दोनों अगले एक हफ्ते हमारे साथ इस यात्रा के भागीदार रहेंगे. दोनों की उम्र 61 साल है लेकिन दोनों 51 साल से भी कम के लगते हैं. लेकिन दोनों इस बात को मानते नहीं. पहले ही दिन वो 20 किमी चले, ठंड में सोये और हमने रात भर खूब बातें की. सारी बातें ज्ञान से भरी थी. मैंने उनसे वो बातें सीखी जिन पर मेरे पैरेंट्स और बड़े लोग कभी बात भी नहीं करते. 


मेरे  पैदल यात्रा करने का लक्ष्य है  अपने दृष्टिकोण को बढ़ाना है और यह परिक्रमा इसी का एक हिस्सा है. आजकल मुझे फेसबुक से उतना एटैचमैंट नहीं है, लेकिन लिखना महत्वपूर्ण है. दो दिन का यह कंटेंट बहुत जल्दी में लिख रहा हूं. फिर कभी इस बारे में बात होगी. फिलहाल तो मैं इस जगह के सौंदर्य में ख़ुद को डुबो देना चाहता हूं. 

। हर- हर नर्मदे. 

(नर्मदा परिक्रमा प्रोजेक्ट गो नेटिव के साथ)

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