North East Diary-1: भूटान की एक झलक

नॉर्थ ईस्ट… नाम सुनते ही दिमाग में जंगल, आदिवासी, शिकार और खाने के नाम पर तंदूर में सेंके जा रहे नॉनवेज की इमेज ही आती है, लेकिन मन के एक कोने में हमेशा से ये खलबली थी कि यार जाना तो है यहां. चाहे जैसे.

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तो फिर एक दिन कमंडल उठ गया और धूनी रमाने के लिए अपन ने लपक के पुष्पक विमान का टिकस कटा लिया. काफ़ी मोहमाया से निपटते हुए आखिरकार गुवाहाटी में कमंडल धर दिए. प्लान था- असम में माजुली, पास में लगा हुआ भूटान, फिर या तो अरुणाचल या मेघालय. तो प्लान सेट हुआ और पहले दिन भूटान यात्रा पर मुहर लगी.

तो पहला दिन कुछ यूं रहा:

सुबह-सुबह कैब पकड़ी और निकल पड़े. ये मेरी पहली विदेश यात्रा थी जहां बिना वीजा पासपोर्ट के जाना था. पासपोर्ट में घुन लग गया, या शायद दीमक खा गए, काहे कि उस पे आजतक एयरपोर्ट पे कोई ठप्पा नहीं लग पाया.

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छोटी-छोटी जगहों पर रुकते, बारिश और ठंडी हवा का मज़ा लेते पहले हम पहुंचे अरुणाचल के एक गांव. जो असम और भूटान दोनों से सटा है. पहाड़ी एरिया की चाय हमेशा से मेरी फेवरेट रही है. चाय पीने रुके ही थे कि बारिश होने लगी. झमाझम बारिश. चाय और मैगी के बाद प्रस्थान का मन बना और बारिश में ही गाड़ी आगे बढ़ा ली. वहां से निकले तो सीधे भूटान वाले रस्ते पर.

भूटान जाने से थोड़ा पहले एक चेक प्वाइंट आता है जिसमें आईकार्ड दिखा के बाकायदा एंट्री होती है कि कितने लोग हैं, कितने पुरुष, कितनी महिला, कितने बच्चे. सारी गिनती. वहां से आगे बढ़े और पहुंचे भैरबकुंडा यानी भूटान सीमा पर बसा असम का एक गांव.

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भारत और भूटान सीमा पर एक बड़ा सा गेट है, जिसे पार करके फिर एंट्री करवानी पड़ती है. यहां ड्राइवर का लाइसेंस से लेकर सबका आईडी चेक होता है फिर आगे बढ़ते हैं. जो बारिश पहले थम चुकी थी वो वापस आ गई. घनघोर बारिश में हम भूटान की सड़कों पर फर्राटा भर रहे थे.

असम से लगा भूटान का जो गांव है समद्रुप जोंखार , वहां देखने के नाम पर सिर्फ एक शिवमंदिर है. बारिश के चलते वहां भी नहीं गए. या कहें, खास दिलचस्पी नहीं रही किसी की. हां, एक रेस्टोरेंट के पास रुके तो विदेशी धरती की बारिश में भीगे खूब. सुखद. इससे आगे का भूटान देखने के लिए अलग पास बनता है.

अब खाने की तलाश शुरू हुई. मन का खाना जब तक ना मिला, भीगते भागते आखिरकार एक होटल कम ढाबा कम बार में रुके. खाना तो नहीं लेकिन पीना भूटान में काफ़ी सस्ता है.

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इस बात का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि हमारे आसपास बैठे लोगों में ज्यादातर असम के ही पास के गांवों के लोग थे और ये उनका रोज का ठिकाना था. उसके पीछे एक वजह ये भी है कि यहां सस्ती शराब के साथ पेट्रोल भी सस्ता मिलता है. पेट जब मदिरा से फुल होने को होता है तो वो गाड़ी की टंकी फुल करा के दिन ढलने तक लौटने लगते हैं.

मदिरा के सस्तेपन का अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि भारत में अपनी एक मात्र निशानी छोड़ के गए विजय माल्या की किंगफिशर वहां आधे दाम में मिलती है. और उसी तरह बाकी ब्रांड की कीमत भी वहां रुपये से भी ज्यादा गिरी है. (ऐसा अपन को प्रतीत हुआ)

इस जगह भूटान स्पेशल के नाम पर चिकन का कुछ भुर्जी टाइप पकड़ाया गया और वेज में कुछ पकौड़े जैसा. मतलब ऐसा खाना था कि जिसे याद ना भी रखा जाए तो कोई गुनाह नहीं होगा.

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खैर, वहां से खा पी के एक्स्ट्रा आइटम ले के, टंकी भरवा के अपन निकले वापिस गुवाहाटी के लिए. आते-आते रात हो गई. ओयो रूम वाले अंकल की तमाम बकवास सुनने और आखिर में उनके मन की शांति के लिए कुछ मधुर कर्ण अप्रिय व्याख्यान देना पड़ा तब जाकर वो ठंडे पड़े.

अगले दिन माजुली के लिए निकलना था. वेज के नाम पर बेहद खराब क्वालिटी की सब्जी और मैदे से बनी मोटी और कच्ची रोटियों के दो चार टुकड़े पानी साथ गटकने के बाद अपन सोने चले गए. ताकि सबेरे जल्दी नींद खुले. काहे से कि डर ये था कि कहीं हम सोते रहे और दोस्त निकल लिए छोड़ के तो…

आगे की कहानी जारी रहेगी…

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