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नर्मदा परिक्रमा: एक मज़ाकिया, दिलचस्प और प्यारे संन्यासी का साथ

14 दिसंबर. पांचवां दिन, 28 किमी. वो दिन जब हम सबसे ज़्यादा चले.

कल रात हम एक आश्रम में रुके जो नर्मदा और सिवनी नदी के संगम के पास है. यहां तक पहुंचने के लिए हमें सिवनी नदी पैदल पार करनी थी. क्या मैं ये सब बताऊं कि किस तरह हम घंटों कीचड़ भरे, पानी से डूबे खेतों से होते हुए, कई बार झाड़ियों में फंसते और खरोंचों के साथ बाहर निकलते हुए आखिर में पैदल नहीं पार कर रहे हैं.

ये ऐसी फीलिंग है जिसे शब्दों से बयां नहीं किया जा सकता. इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है खुद. ये सब किसी कहानी की तरह है. अक्सर जिस तरह हम रहने की ख्वाहिशें पालते हैं.

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आज सुबह, हमने 8:30 बजे चलना शुरू कर दिया. हमने हाइवे से जाने का फैसला लिया ताकि कुछ जरूरी सामान खरीद सकें, जो हम बीते चार दिन में ख़त्म कर चुके थे. सच कहें तो हम पोहा और जलेबी खाना चाहते थे.

आप समझ सकते हैं कि अपनी इच्छाओं और दिमाग पर काबू पाना आसान नहीं है. जैसे ही हम हाइवे पर पहुंचे एक शख्स तेज़ी से हमारे पास आया और चाय पीने का आग्रह किया. हमने खुशी खुशी उसका न्यौता स्वीकार और साथ चल दिए.

कुछ पुरुषों और महिलाओं ने हमें उत्सुकता से घेर लिया. आखिरकार हम थोड़े अलग से दिख रहे यात्री जो हैं. हर कोई हैरान है कि इतनी कम उम्र में हम ऐसे सफ़र कर रहे हैं वो भी एक विदेशी लड़की के साथ.

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हमारे साथ एक संन्यासी भी था जो तमिलनाडु से था और वाकई अपने डर को भगाना चाहता था. लेकिन उस बारे में बाद में बात होगी.

अभी के लिए इतना कि वो काफी मज़ाकिया, दिलचस्प और प्यारा था. वो नंगे पैर चल रहा था. वो परिक्रमा में हमसे एक दिन आगे था. ये उसका चौथा दिन था जबकि हमारा पांचवां. वो हिन्दी नहीं बोलता था, जिसकी वजह से उसे मदद मांगने में परेशानी होती थी. वो पूरा दिन हमारे साथ चला.

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हम 28 किलोमीटर चले. सुबह 8:30 से शाम 6:00 बजे तक. रास्ते में कई जगह चाय और स्नैक्स के लिए रुके भी, बहुत से घरों के लोगों ने हमें कुछ खाने-पीने के लिए रोका. कई बार हमने लोगों को मना किया और कई बार हां भी की. ये सब बहुत भावुक करने वाला है.

एक प्वाइंट पर बाबा जी ने हमसे कहा कि वो हमारे साथ गुजरात तक चलेंगे. मैंने उनसे कहा कि सब नर्मदा पर छोड़ दो, खुद पर, अपने संन्यास पर भरोसा रखो और अकेले चलो. उसने मुझे कहा कि मैं हिन्दी के कुछ ज़रूरी शब्द सिखा दूं.

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आज मेरे पैर पर पहला छाला पड़ा. जब चलना बंद करता हूं तब मेरे पैर दर्द करते हैं. चलते समय मैं शरीर का ज़्यादा ध्यान नहीं रखता.

हम आज चंदन घाट पहुंचे और हर दिन की तरह अपना खाना खुद बनाया और नर्मदा के किनारे एक आश्रम में आराम किया. सचिन और कैटलीना भी अपने फ़ोन पर व्यस्त हैं.

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कल थोड़ा धीरे चलने का प्लान है.

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नर्मदे हर!

(नर्मदा की ये यात्रा प्रोजेक्ट गो नेटिव के साथ)

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