नर्मदा परिक्रमा: जुनून और रोमांच से भरा सफ़र ‘प्रोजेक्ट गो नेटिव’ के साथ

नर्मदा – एक ऐसा नाम जिससे लगभग सारा मध्य प्रदेश परिचित हैं. एक ऐसी नदी जिसके किनारे न केवल आदिम सभ्यता ने जन्म लिया बल्कि नवीन सभ्यता भी उसी के बल पर अपना जीवन-यापन कर रही है.

नर्मदा को मध्य प्रदेश में केवल नदी ही नहीं माना जाता बल्कि यहां इसे मां की तरह पूजा जाता है. जो स्थान शास्त्रों में गंगा का है उससे भी ऊपर नर्मदा को माना जाता है.

ऐसा माना जाता है कि नर्मदा के दर्शन मात्र से सारे कष्टों दूर हो जाते हैं. इसी क्रम में नर्मदा परिक्रमा का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है. सामान्यतः नर्मदा के उद्गम स्थान अमरकंटक से परिक्रमा शुरू करके वापस इसी स्थान पर परिक्रमा को खत्म किया जाता है.

ये यात्रा अगर पैदल की जाए तो कुल परिक्रमा पथ की लंबाई लगभग 2856 किमी. है. वहीं कुछ लोग वाहन के ज़रिए भी ये परिक्रमा करते हैं.

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हम आपको जिस नर्मदा परिक्रमा पर ले जाएंगे वो वास्तविक अनुभव है. ये अनुभव और कहानियां साझा की हैं हमारे एक मित्र हितेश भट्ट ने. हितेश एक बजट ट्रैवलर, ब्लॉगर, राइटर, व्लॉगर हैं. साथ ही वो ऋषिकेश में मोक्ष कैफे के को-ऑनर भी हैं.

फेसबुक से जान-पहचान के बाद हितेश से पहली मुलाकात अमरकंटक में हुई. उस समय वो नर्मदा परिक्रमा शुरू ही करने वाले थे. मैं मिलकर बड़ा अचंभित था क्योंकि मेरा भी सपना है कि कभी नर्मदा परिक्रमा की जाए.

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खैर भौतिक रूप से मैं इनके साथ परिक्रमा में नहीं था लेकिन वर्चुअल रुप से था. इनके साथ ही मुझे मिले कैटलीना और सचिन जो कि यात्रा में हितेश के साथ थे.

हितेश फेसबुक पर प्रोजेक्ट गो नेटिव
 (https://www.facebook.com/projectgonative/) के ज़रिये इन अनुभवों को शब्दों में ढाले हैं और उन्हीं कहानियों को हमने यहां आप के लिए पेश किया है. तो आइए चलते हैं नर्मदा परिक्रमा पर…

DAY 0: हमारा सफ़र शुरू हो चुका है. ट्रेन का सफ़र 18 घंटे का है. दिल्ली से जबलपुर. वहां से अमरकंटक का रास्ता बस से 6-7 घंटे का है.

ज़िंदगी की सबसे मज़ेदार चीज़ ये है कि पिछले सप्ताह मैं मॉन्जा लद्दाख में था जहां का तापमान -20 डिग्री से नीचे था. एक गांव में सोलर हीटर प्रोजेक्ट के लिए हम 30किमी पहाड़ चढ़े. वहां से निकलने से पहले हमने सिंधु ज़ंस्कार नदी देखी. ज़ंस्कार लगभग जमी हुई और सिंधु का पानी नीला और ठंडा.

मेरी इच्छा थी कि मैं कैलाश मानसरोवर जाकर सिंधु का उत्भव स्थान देखूं. 2 दिन बाद मैं ऋषिकेश में हूं और गंगा में आखिरी डुबकी लगाने जा रहा हूं. जिसके ठंडे पानी से मेरे कान सुन्न हो गए. मुझे गंगा पसंद है लेकिन फिलहाल अब मैं नर्मदा के पास जाना चाहता हूं.

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ऋषिकेश में अपार्टमेंट से निकलने के एक मिनट पहले जोरदार भूकंप का झटका आता है और हमें डरा देता है. शायद ये एक संकेत था कि जाने का वक़्त हो गया. जिस ट्रेन से जाना था वो चार घंटे पहले कैंसिल हो चुकी थी. कारण पता नहीं चला. हितेश अब भी उसके रिफंड के लिए कोशिश में है.

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मेरी पिछली चार ट्रेन यात्राओं का अनुभव काफ़ी मजेदार है: पहली ट्रेन- 6 घंटे देरी से, दूसरी ट्रेन 13 घंटे देरी से, तीसरी ट्रेन 24 घंटे देरी से और आखिरी ट्रेन कैंसिल हो गई.

इन तमाम चीजों के बाद भी हमने ट्रेन से जाने का फ़ैसला लिया और हैरानी की बात थी कि हमें तत्काल में टिकट मिल गया.

ट्रेन में सभी मर्दों को जब भी मौका मिला उन्होंने कैटलीना को ऐसे देखा जैसे वो कोई अजूबा हो और फिर भी हम कहते हैं कि सभी मर्द एक जैसे नहीं होते लेकिन हां, बहुत से मर्द ऐसे ही होते हैं जैसा कि हितेश ने बिल्कुल सटीक कहा, ”सभी के पास आंखें हैं लेकिन कुछ की अपग्रेडेड हैं. उनकी आंखों में स्कैनर लगे हैं और जैसे ही कोई महिला देखते हैं वो इसे एक्टिवेट कर लेते हैं.” मुझे लगता है हम सब ये जानते हैं लेकिन बेहद सामान्य सा है.

ट्रेन दो घंटे देरी से पहुंची. हमारे लिए ये हैरानी की बात थी. हम जबलपुर पहुंचे तो लोगों ने हमें विदेशी समझा… शायद हमारे पहनावे की वजह से ऐसा हुआ और हमसे पूछा गया कि क्या हम ओशो आश्रम जाना चाहते हैं.

जबलपुर के बारे में अच्छी चीजें: खाना अब भी सस्ता है यहां. (6 प्लेट पोहा और 6 चाय सिर्फ 90 रुपये में.) और यहां के लोग अब भी बहुत मददगार हैं.

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220 किमी की अमरकंटक तक की बस यात्रा 8 घंटे की थी. लेकिन ये सफ़र अच्छा था. बाहर का नज़ारा शानदार था. बस लगभग हर स्टॉप पर रुकी लेकिन वहां कहीं आधिकारिक तौर पर चाय के लिए नहीं रुकी. और ऐसे में जब आप एक महिला हैं तो आपको पेशाब करने के लिए काफ़ी देर तक कंट्रोल किये रहना पड़ता है.

डिंडोरी से आगे निकलते हुए हमने नर्मदा को देखा. बहुत कम पानी लेकिन फिर भी खूबसूरत नज़ारा. अचानक मुझे साइकिल की सवारी याद आ गई और मैं खुद को घाट पर सोता हुए महसूस करने लगा.

To Be Continue…

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